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जनवरी, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बार-बार आना चाहूंगा तुम्हारे पास -रायपुर

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आज जब हर व्यक्ति छोटे-छोटे स्वार्थों के लिये दूसरों को छोडिये अपने निकटतम आत्मीय जनों को छलने से ना तो चूकता है ना हिचकता है तब गिरीश मिश्र जैसे लोगों की उपस्थिति नैकट्य रिश्तों में विश्वास जगाती है।कुछ कवि-सम्मेलनीय प्रस्तावों को  निरस्त कर जब मैने रायपुर 'संगवारी पोस्ट अवार्ड' एवं बबनप्रसाद मिश्र हीरक जयंती समारोह 'में जाने का निर्णय किया तो वह कोई अदृश्य शक्ति ही थी जिसने मुझे प्रेरित किया वरना इन दिनों कदहीन ओछे लोगों को हर साहित्यक और सांस्कृतिक मंच पर काबिज़ देख ऐसे कर्यक्रमों से किनारा करना ही श्रेयस्कर समझता हूं।परंतु अब मैं कह सकता हूं कि यदि मैं इस कार्यक्रम में नहीं जाता तो यह मेरे जीवन की भयंकर भूलों में से एक होती । १६ जनवरी को पं० सुरेश नीरव और मै जब इंडिगो की फ्लाइट से रायपुर के 'विवेकानंद एअरपोर्ट' पर उतरे और हमने भाई गिरीश मिश्र को अपनी सदाबहार काले चश्में और सफेद शर्ट  पैंट में हाथ हिलाते देखा तो लगा कोई अपना हमारे इंतजार में है १५-२० मिनट में हम पहुंच गये १० ,रवि नगर रायपुर ।मन में विचार आया कि ये १० न० कुछ चमत्कारी तो अवश्य है।१० जनपथ,१०डाउनि...

भारतमाता की पीडा ही निज शब्दों में कहता हूं

जिसमें सारा देश धधकता उसमें मैं भी जलता हूं भारतमाता की पीडा ही निज शब्दों में कहता हूं पच्चीस करोड मुसलमान गद्दार नहीं हो सकता है हर एक पगडी वाला तो सरदार नहीं हो सकता है लेकिन सौ करोड हिंदू की हत्या की जो बात करे अपनी ज़हरीली ज़ुबान से रोज नये आघात करे उसका भारत की धरती पर कोई काम नही होगा किसी ओवेसी या इमाम का नामो निशान नही होगा जब तक ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा हम सब नहीं उठायेंगे वीर जवानों की लाशें ही हम तोहफे में पायेंगे गोरी और गज़नवी को जो अपने पुरखे कहते हों जिनकी दुआओं में भारत के दुश्मन हरदम रहते हों वो भारत के गद्दारों की नाज़ायज़ औलाद है ऐसे कायर सत्ता वाली गलियों में आबाद हैंं कुछ घंटों में पूरा इंडिया गेट ज़ाम कर देती थीं ज़ंतर-मंतर को संसद को हल्ले से भर देती थीं हरदम शोर मचाने  वाली वे आवाज़ें मौन हैं आखिर इम चेहरों के पीछे वाले चेहरे कौन हैं? जब तक उन चेहरों के ऊपर कालिख नहीं लगायेंगे वीर जवानों की लाशें ही हम तोहफे में पायेंगे जिसमें सारा देश धधकता उसमें मैं भी जलता हूं भारतमाता की पीडा ही निज शब्दों में कहता हूं जब तक अफज़ल जेल में बैठा मुर...

चिंतनीय बात है आम मुसलमान की खामोशी

मित्रों कई बार बडे संकटों की आड लेकर स्वार्थी तत्व अपना ऐज़ेंडा लागू कर देते हैं।दिल्ली गैंग रेप कांड की आड लेकर भी कुछ लोगों ने अपनी रोटियां सेकना या यों कहें उनके अवचेतन में जो है उसे व्यक्त करना शुरू कर दिया।मैं जिस परिवेश में पला बढा उसमें कट्टरता की कोई गुंजायश कभी नही थी।छात्र जीवन में मेरे एक मित्र जो अलीगढ यूनीवर्सिटी में लेक्चरर थे ।कहने लगे अरविंद तुम्हे क्या लगता है पाकिस्तान का बनना गलती थी।मैने कहा-इसमें शक की गुंजायश कहा ये मिस्टेक नहीं ब्लंडर था।वे फिर बोले अगर फिर से भारत-बांग्ला-देश और पाक मिला दिया जाय तो क्या ये गलती सुधर जायेगी ?मैने कहा--बिल्कुल सुदर जायेगी जब हिंदू -मुसलमान दोनो को अहसास हो जायेगा कि साथ रहना उनकी नियति है तो ज़रूर कटुता भि एक दिन समाप्त हो जायेगी और वे सपनों नही हकीकत के देश में खुशी ढूढेंगे।तब वे बोले हां दूसरा तरीका ये हो सकता है कि अब फिर से मिलाकर आबादी के अनुपात में बांटा जाय तो कश्मीर जैसी समस्याओं का भी समाधान हो जायेगा। मैने उन्हें एक क्षण तक घूर कर देखा फिर कहा --मियां दिक्कत यही है तुम तमाम बौद्धिकता के बाद बांटने पे आ जाते हो और हम ...