कवि सम्मेलन के मंचों पर अक्सर मैं समस्त कलमकारों(लेखकों,कवियों,पत्रकारों,मसिजीवियों)को एक मुक्तक समर्पित करता हूं,आज इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों को भी कलमकार मानते हुये ये मुक्तक दे रहा हूं-- सिर्फ नेता ही नहीं कुछ और भी मक्कार हैं जो कलम को बेंचते हैं ,वे भी तो मक्कार हैं पूरी पीढी है नपुंसक रक्त में गर्मी नहीं इसलिये करगिल यहां औ यहां कंधार हैं
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चेत सके तो चेत नहीं फिर चेत कभी ना पायेगा
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Arvind pathik
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धधक रहा कश्मीर भारती का मस्तक जलता है सीमा के उस पार निरंतर ही कुचक्र पलता है साहस है , बल है , कौशल है , किंतु सहन करते हैं लेकिन , इसका अर्थ नहीं यह हम तुमसे डरते हैं चाहें तो दो दिन में ही हम पाक जीत सकते हैं हम शोणित की नदी धरा पर अभी खींच सकते हैं किंतु रक्त की नदी कभी क्या द्वेष धुला पायेगी क्या हिंसा की आग मनुजता को ही नहीं खा जायेगी और मनुजता के बदले में जय लेकर के क्या होगा ? ऐेसा करने से पुनः क्या नही महाभारत होगा ? एक महाभारत ने भारत की संस्कृति को नष्ट किया मानव मूल्यों की हत्या की और मनुज़ को भ्रष्ट किया भीष्म सरीखे योद्धाओं पर भी छिपकर ही बार हुआ अभिमन्यु सी प्रतिभाओं का छल-बल से संहार हुआ अतः युद्ध से पहले हम सौ बार तु्म्हें समझायेंगे स्वयं कृष्ण भी शांति दूत बन द्वार तुम्हारे जायेंगे इस पर भी तुमने यदि अपने बंद नहीं षडयंत्र किये कुटिल कुचक्रों के तुमने यदि बंद नहीं ये यंत्र किये तो मुरली की तान नहीं फिर पांचजन्य बोलेगा गांडीव की टंकारों से---------- भूमंडल डोलेगा लाहौर से पेशावर तक लाशें ही...
ramprasad bismil
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Arvind pathik
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V पं० रामप्रसाद बिस्मिल की दो गज़लें काकोरी कांड में गिरफ्तारी और फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद पं०रामप्रसाद बिस्मिल एक बार जेल से फरार होकर अंग्रेज सरकार को हतप्रभ कर देना चाहते थे।चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह ने उन्हे छुडाने की कई बार योजना बनाई पर वे सफल ना हो सके अतः उन्हें प्रेरित करने के लिए एक गज़ल साथियों तक भिजवाई ।अंग्रेज सरकार ने भी इसे साधारण इश्के-मिजाज़ी की गज़ल समझकर जाने दिया। १ मिट गया जब मिटने फिर सलाम आया तो क्या? दिल की बरवादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या? काश अपनी ज़िंदगी मे हम वो मंज़र देखते, यूं सरे-तुरबत कोई महशर खिराम आया तो क्या? मिट गयीं जब सब उम्मीदें,मिठ गये जब सब ख्याल उस घडी गर नामावर लेकर पैगाम आया तो क्या ? ऐ, दिल-ए-नाकाम मिट जा तू भी कू-ए-यार मे फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या? आखिरे शब दीद के काबिल थी बिस्मिल की तडप सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए -बाम लाया तो क्या ? इसी मूड की उनकी एक गज़ल और मिलती हैः--- २ यह चारागर उल्फत गाफिल नज़र आता है, बीमार का बच जाना मुश्कि...
।अमर शहीद अशफाकउल्ला खां की एक गज़ल
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Arvind pathik
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दोस्तों कई दिन बाद लोकमंगल पर आया हूं ।अमर शहीद अशफाकउल्ला खां की एक गज़ल पेश-ए-खिदमत है--- सितमगर अब ये आलम है तेरे बीमारे फुरकत का लबों पर दम है दिल में बलबला शौके शहादत का मेरी दीवानगी पर चारागर हैरां न हो इतना यही अंज़ाम होना चाहिए नाकाम उल्फत का बुताने संग दिल सुनते नहीं फरियाद बेकस की निराला ढंग है उन खुदपरस्तों की हकूमत का मिटा कर जानों दिल अपना किसी ज़ालिम ज़फाजू पर तमाशा अपनी आंखोम देखता हूं अपनी किस्मत का हविस हूरों कि हो जिस में दिलाए याद गिल्मा की जनाबे शेख मैं कायल नहीं ऐसी रियाज़त का मज़ा जब है कि वह कह उठेंअशफाक उनका क्या कहना गज़ल है या मुरक्का है तेरे वक्ते मुसीबत का।
मोड को पकडे खडा हूं
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Arvind pathik
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चला जाऊंगा, मैं कोई और राह पकडकर यही सोचा होगा तुमने मोड पर मुझसे बिछुडकर किंतु़ मैं तो मोड को ही पकडकर अब तक खडा हूं सिर्फ,इतनी आस में शायद कभी तुम मुड के आओ देखकर के मोड खाली सडक खाली तुम कहीं फिर मुड न जाओ तुम वहीं फिर मुड न जाओ मैं सडक पकडे खडा हूं यह सडक का मोड मुझको प्राण से ज्यादा सगा है यों बरसों-बरस इसने मुझको सताया है ठगा है किंतु़,साक्छी हैं गगन-धरती-दस दिशाएं भले कितनी ही रही हों कठिन दुष्कर प्रतीक्षाएं मोड पर से उचकते -झांकते अब तक नही है आंख झपकी ना ही टपकी-डबडबाई क्योंकि है विश्वास लौटोगे यहीं से और पाओगे मुझे यों राह तकते तो तुम भी तो उछल जाओगे खुशी से तुम्हे देने को तनिक सी खुशी मील के पत्थर सा सडक जकडे खडा हूं तुम जहां से मुड गये थे आज भी उस मोड को पकडे खडा हूं । ------अरविंद पथिक
मौन मुखर होगा बोलेगा,
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Arvind pathik
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संख्या बल से चुप कर दो पर मौन मुखर होगा बोलेगा, चाहे जितने जोर लगा लो , झुंड बना लो ज्यों ही चलूंगा बौनों का अंतर डोलेगा, नये-नये तर्कों को गढ लो बांसों के ऊपर भी चढ लो ओछापन हर जगह दिखेगा, ओछापन हर तरह दिखेगा, मौन मुखर होगा बोलेगा, ज्यों ही अधरों को खोलेगा, कंठित कहो कहो तुम पागल या आजमाओ तुम अपना बल सच का सूरज चुपके-चुपके आहिस्ते से उजियारी गठरी खोलेगा जोड-घटाना हानि लाभ का चक्कर हमसे नही चला है,नही चलेगा, होम करेंगे तो यह तय है फिर से हमारा हाथ जलेगा मगर जरुरत पडी तो सबसे पहले आतुर मन स्वाहा बोलेगा ज्यों ही अधरों को खोलेगा मौन मुखर होगा बोलेगा।