Friday, June 01, 2012

हिंदू :जाति धर्म- आदि से अंबेडकर तक


 जाति और धर्म बेहद संवेदनशील और असतित्व से जुडे मुद्दे हैं।वर्तमान आरक्षण और सांप्रदायिकता से लेकर लोकतंत्र और समूची राजनैतिक सत्ता चाहे -अनचाहे धर्म और जाति से संचालित हैं ।निजी रुप मे हमे नास्तिक और जाति विहीन होने की आज़ादी हो सकती है पर समूह के रूप में हम जाति और धरम से कम से कम भारत देश मे किनारा नहीं कर सकते अतः यह बहुत ज़रूरी है कि हम जाति और धर्म के उद्भव औरvप्रासंगिकता के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दें।
भारत जिसे हम सुविधानुसार या कालक्रम में आर्यावर्त,जंबूद्वीप ,भारतवर्ष ,हिंदुस्तान या इंडिया जो भी कहते हैं या कहते रहे हैं,में धर्म आज की बंधी बंधाई परिभाषा जिसमें एक ईश्वर ,एक प्रवर्तक ,एक पुस्तक या एक विचार के रूप में रहा ना ही उसका कोई एक नाम भी नही रहा पर मोटे तौर पर उसे सनातन धर्म कहा गया।सनातन धर्म जाति का उल्लेख कहीं नहीं है।वहां वर्ण है-ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र।वर्ण कोई अपरिवरतनीय व्यवस्था नही है।विश्वामित्र से लेकर कई पाश्चात्य मनीषियों को रिषि स्वीकारा गया है।
राजर्षि,महर्षि ब्रहम्रषि ,जैसे उद्बोधन भी यह सिद्ध करते हैं कि एक वर्ण से दूसरे वर्ण मे परिवर्तन संभव था।फिर प्रश्न उठता है जाति कहां से आयी।सनातन धर्मी जब अन्य समुदायो के संपर्क मे आये तो उन्होने अपने वर्णानुक्रम के अंतिम पायदान शूद्र में उन सभी समुदायों को शामिल करना,स्वीकारना शुरू कर दिया जो इस विशाल भूभाग पर या तो पहले से रहे थे या बाहर से आ रहे थे पर इसमें कही बल प्रयोग नहीं था ।किसी को उसकी समस्त कमजोरियों और अच्छाइयों के साथ स्वीकारने का इससे अच्छा उदाहरण सनातन धर्म के अतिरिक्त कहीं नहीं मिलता।शूद्र वर्ण कहीं से भी भेदभाव का प्रतीक नही था।अपितु विशाल सनातन धर्म का बाहक मानकर उसे पैर की संज्ञा दी गई थी जिस पर संपूर्न धर्म को ढोया जाना था।हां बौद्धिक क्षमताओं में कमतर होने के कारण और रक्त शुद्धता को बनाये रखने के विचार से अब वर्ण जो कि जाति में परिवर्तित हो चुका था ने अपने चारों ओर अपरिवर्तनीय खोल ओढ लिया।यह प्रक्रिया हज़ारों सालो में सहज व स्वाभाविक ढंग से हुई।
हजारों वर्षों से चली आ रही इस प्रक्रिया को किसी ने चुनौती भी नहीं दी पर धीरे -धीरे वे समुदाय जो शूद्र वर्ण में नई नई जातोयों के नाम से सम्मिलित हो चुके थे संख्या मे अधिक होने के कारण और जीवन की सहज आवश्यकताओं के पूर्ति के लिये आवश्यक कौशल संपन्न होने के कारण सामाजिक व्यवस्था में अब ज्यादा महत्व पाने को आकुल हो चले थे . सैन्य कौशल में पारंगत क्षत्रिय वर्ग तो बौद्धिक ब्राह्मण वर्ग को शुरू से ही चुनौती दे रहा था और वरन परिवर्तन की व्यवस्था बंद हो जाने के कारण पुरानी वर्णानुक्रम की व्यवस्था से अत्यधिक रूष्ट था एक ऐसे मौके की तलाश में था ।जहां से वह पुरानी व्यवस्था को चुनौती दे सके।वनों की अधिकता ,वन्यजीवों की अधिकता और अस्तित्व के प्रश्न ने बलि प्रथा और आखेट जैसी परंपराओं को अब तक सनातन धर्म की सामाजिक व्यवस्था की धुरी बना रखा था और ब्राह्मण वर्ग जोकि अपने को समस्त व्यवस्था को बनाये रखने के लिये ही नियुक्त किया गया समझने लगा था ,इन परंपराओं को बढावा दे रहा था ,के विरूद्ध एक वातावरण संपूर्ण समाज मे बनने लगा था।हजारों सालो तक बौद्धिक संघर्ष के पश्चात पहली बडी और तर्क संगत पहल जैन धर्म और फिर उससे भी ज्यादा तार्किक ढंग से बौद्ध धर्म के रूप में हुई।
महत्वपूर्ण यह है कि अब तक भी हिंदू शब्द का प्रयोग इस पुराने धर्म के लिये नहीं हुआ था।
इन नवगठित धर्मों ने जाति विहीन और वर्ण विहीन समाज के लोकलुभावन नारों से शीघ्र ही हर आमो -खास को प्रभावित कर लिया।राजा जोकि क्षत्रिय होते थे, ने हाथों हाथ इन धर्मों को लिया।उदाहरण के लिये अपने अंतिम दिनों में चंद्रगुप्त मौर्य जैन हो गये थे अशोक बौद्ध।परंतु इस जोर के झटके से सनातन धर्म शीघ्र ही उबर गये।इसमें सनातन धर्म की खूबियों ने कम बौद्ध और जैन धर्मों की खामियों ने ज़्यादा महत्वपूर्ण रोल प्ले किया।जो बौद्ध धर्म मूर्ति पूजा,अनीश्वरवाद,तर्क और आडंबर हीनता और अहिंसा के कारण लोकप्रिय हुआ था  वह ५०० वर्ष के भीतर महायान व हीनयान में ना केवल बंट गया अपितु तांत्रिक अभिचारों और बुद्ध की मूर्तियों की पूजा ने सनातन धर्म के ढकोसलों को भी मीलों पीछे छोड दिया।सबसे खतरनाक बात यह हुई कि जो शस्त्र और शक्ति अस्तित्व के लिये अनिवार्य थे उनसे बचने की आड प्रदान करने का माध्यम बन गया बौद्ध धर्म ।कुल मिलाकर बौद्ध धर्म कायरता को महानता का नाम देने का साधन भर केवल ५००-७०० वर्षों के बीच हो गया।और इस अवसर का लाभ उठाकर सनातन धर्म ने  कब इन धर्मों को लगभग अपने में समाहित कर लिया इसका पता इन धरमों को भी नहीं चला।गंगा की तरह सभी को आत्मसात कर सकने का आधार थी इस धर्म की जाति व्यवस्था जो हर नये समाहित होनरे वाले समप्रदाय व पंथ के लिये एक नयी जाति गढ लेती थी और बौद्ध जैसे बडे हो चुके धर्म को समाहित करने के लिये इसने बुद्ध को दशम अवतार मानने में भी परहेज़ नहीं किया।शक ,हूण ,कुषाण,गंधर्व ,किन्नर आदि असंख्य समुदाय आज भी किस जाति के रूप मे सनातन धर्म के अंग है इसे पहचानना तक मुश्किल है।
जो धर्म यूरोप और पश्चिम एशिया से आये ईसाई और यहूदी धर्मों से विचलित नही हुआ उसे पहली बार अरब से आये हिंसावादी ,भाइचारा व समता और प्रसार की कामना से लबरेज़ इस्लाम ने हिला दिया।बौद्ध और जैन धर्म चूंकि यही उपजे थे उनमें संस्कार भी इसी मिट्टी के थे अतः यहां की कमियों अच्छाइयों के चलते वे सनातन धर्म मे सहज ही समा गये ।पर इस्लाम  कबीलाई संस्कृति को एक सूत्र मे पिरोकर आगे बढा था।दुर्गम परिस्थितियों मे पनपा था अतः सिंधु पार की शस्य श्यामला भूमि की समपन्नता और जीवन के लिये आवश्यक संसाधनों की सहज उपलब्धता ने इक तरफ चकित तो दूसरी तरफ आक्रांत करने के लिये प्रेरित किया।इस भूमि की संपन्नता से आकृष्ट हो इस्लाम से ७-८ सौ साल पहले से युरोप से आने वाले समुदाय तो यहीं रच पच गये थे पर उन्होने सिंधु पार के इस भूभाग को हिंदुस्थान कह दिया था और इस पर बसने वाले हिंदू कहलाने लगे थे।मुसलमानों ने भी इस हिंदू शब्द को शक ,हूण ,कुषाण से ही ग्रहण किया ।स्वयं सनातन धर्माबलंबियों ने अपने को किसी धर्म विशेष के रूप मे परिभाषित नही किया था।उनके लिये धर्म का मतलब था जीवन जीने का तरीका।जैसे आग का धर्म कहा गया जलाना और पानी का भिगोना।सनातन धर्म तो '; धारयति स धर्म;' वेद ,उपनिषद आदि धार्मिक ग्रंथ नही हैं ये या तो प्रकृति के प्रति आभार ज्ञापन हैं या जीवन क्या और क्यों का विवेचन हैं? कुरान ,बाइबिल,अवेस्ता आदि की तरह कोई एक किताब या भगवान इस सनातन ध्रर्म का आधार नही है ।अतः सनातन धर्म जो परिवर्तित होकर हिंदू धर्म बन चुका था में जाति अत्यंत महत्वपूर्ण है।हिंदू धर्म हजारों सालों से सुविधापूर्ण जीवन और सुगठित सांस्कृतिक आधार के कारण राजनैतिक सत्ता के परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता था।उसकी जडें से ज़्यादा सामाजिक व्यवस्था में थीं और राजनीतिक उठापटक के बाबज़ूद छोटे-छोटे जनपद राज्यों में बंटे इस विशाल देश की प्रशासनिक व्यवस्था हिमालय से कन्याकुमारी और कच्छ की घाटी से गुवाहटी तक एक समान थी,एक -दो अपवादों को छोडकर।इस्लाम के आगमन को इस हिंदू धर्म ने वैसे ही लिया जैसे सिकंदर का उसके परवर्ती शक,हूण या कुषाणों का आगमन था।अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दंभ में ना तो हिंदू धर्म उपेक्षित किये जा रहे शूद्र वर्ण जिसमें अब तक हजारों जातियां शामिल हो चुकी थीं के गुस्से को समझ पाया था और ना ही कबीलाई नृशंसता और धार्मिक ऊन्माद की सान पर तेज की गयी तलवार से लैस  ज़ेहादी इस्लामिक सोच को।हिंदू धर्म का क्षत्रिय वर्ण समझता था कि ये लुटेरे शीघ्र ही लूटपाट कर भाग जायेंगे और ब्राह्मण वर्ग की सोच थी कि इन्हें एक और जाति बनाकर शूद्र वर्ण में शामिल कर लेंगे वैश्यों को अपने आर्थिक हितों की चिंता थी पर वे मन ही मन आश्वस्त थे कि आज नहीं तो कल धन बल से वे सत्ता को अपने इशारों पर चलने के लिये मज़बूर कर ही देंगे और शूद्र कही जाने वाली जातियां तो मानों मौके की तलाश में थी कि किसी तरह इस हिंदू धर्म से बाहर निकलने का मौका मात्र मिले तो इन वामनो,ठाकुरों को औकात बतायी जाय।इस्लाम ने जातिविहीन समाज का सपना उनकी आंखों के समक्ष रखा तो वे सहर्ष उसमें शामिल होते चले गये।इस्लामिक आक्रांताओं से पूर्व ही सूफी आंदोलनों की शक्ल में हिंदू धर्म के निचले पायदान पर स्थित जातियों के धर्मांतरण की नींव रखी जा चुकी थी।अब तक यदि ये जातियां हिंदू धर्म में थी तो सिर्फ इसलिये क्योंकि विकल्प नहीं था। जीवन जीने की मूलभूत सुविधायें थी पर सत्ता मे भागीदारी का अवसर नहीं था।इस्लाम ने
हिंदू धर्म की इस कमजोर नब्ज़ को बखूबी पकडा और इन जातियों को सपने दिखाये उदाहरण के लिये नाई जाति का एक व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर जब मलिक काफूर नाम रख लेता है और अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति बन जाता है
तो वह धार्मिक कट्टरपन और नृशंसता में अलाउद्दीन खिलजी को मीलों पीछे छोड देता है।ऐसे कई उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित मिल जायेंगे। इस्लाम की क्रूरता और सत्ता की महात्वाकांक्षा ने हिंदू धर्म को किंकर्तव्यविमूढ कर दिया।राजनैतिक प्रभुता के छिनने  और सांस्कृतिक उच्चता के दंभ की निस्सारता पहली बार महसूस की गयी और २-३ सौ बरसों के लिये यह समाज अवसाद में चला गया।परंतु जिस ब्राह्मण वर्ग पर अपनी गफलतों में खोये रहने का अभियोग लगा था जिस पर दिशा ना दे पाने का आरोप सिद्ध हो गया था उसने आत्म मंथन कर भक्ति आंदोलनों के माध्यम से समाज के मनोबल को मज़बूत करने का काम शूरू कर दिया था।विगत में भी वह चाहें बौद्ध धर्म की चुनौती से निबटने को आदि शंकराचार्य के माध्यम से सांस्कृतिक पुनर्जागरण रहा हो या इस्लाम के आगमन के समय वीरगाथा काल का दौर रहा हो ब्राह्मण वर्ग ने बौद्धिक -सैद्धांतिक आधार देने का प्रयास निरंतर किया था।परंतु एक बार राजनैतिक सत्ता के जब दूसरी संस्कृति के हाथों में जाने का विश्वास दृढ हो गया तो भक्ति आंदोलनों के माध्यम से जनता को जोडे रखने और मनोबल बढाये रखने का काम भी ब्राह्मण वर्ग ने शुरू कर दिया इस बात को सिद्ध करने के लिये किसी बडे बौद्धिक व्यायाम की आवश्यकता नहीं है।इस्लामिक आक्रांताओं के धार्मिक प्रसार के जोश का मुकाबला हिंदू धर्म केवल भक्ति आंदोलनो से नही कर सकता था ।इसके अतिरिक्त जो जातियां समानता और सत्ता में भागीदारी की उम्मीद से मुसलमान हो गयीं थीं वे भी हकीकत की ज़मीन पर वहां भी स्वयं को उतना ही उपेक्षित और अपमानित पा रही थीं जितना हिंदू धर्म में थीं ।उन्हें केवल एक ही संतोष था कि वे शासक वर्ग से संबंध रखती हैं ।अकबर ने उदार,सहिष्णु व्यवहार से हिंदुओं के घआव पर मरहम लगाने का काम किया तो औरंगज़ेब ने हिंदुओं को अपमानित कर उनके घाव उधेडने का।भक्ति आंदोलनों की भाव भूमि पर हिंदू धर्म ने संगठित होकर छिटपुट रूप से बहुत पहले ही युद्ध शुरू कर दिया था पर औरंगज़ेब ने उन्हें तत्काल कुछ करने पर विवश कर दिया।अतः सिख धर्म जो कि एक तरह से भक्ति आंदोलनों का ही एक हिस्सा था खालसा पंथ मे परिवर्ति होकर इस्लामिक संस्कृति के विरूद्ध शस्त्र संघर्ष का अगुवा बना।अपने-अपने ढंग से शिवाजी और छत्रसाल जैसे राजा भी कुल मिलाकर हिंदू धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा की ही लडाई लड रहे थे।महत्व पूर्ण यह है कि इस नवगठित खालसा पंथ में उस समय हर हिंदू परिवार के बडे बेटे को शामिल कर जैसा सशस्त्र संघर्ष हिंदू धर्म ने शुरू किया था वह अपने आप में अनोखी घटना थी।इस बार हिंदू धर्म ने किसी नयी जाति का आविष्कार नहीं किया था अपितु जाति विहीन सशस्त्र धर्म ही खडा कर दिया था। औरंगज़ेब की मृत्यु के साथ ही हिंदू मुस्लिम संघर्ष समाप्त हो गया।अब जो भी संघर्ष था वह राजनैतिक था।पर युग बदल चुका था।भारत वर्ष की जीवन के लिये अनुकूल परिस्थितियों ने मुसलमानों की संघर्षशीलता भी समाप्त कर दी थी।वैसे भी ज़्यादातर मुसलमान हिदुओं की निम्न समझी जाने वाली परिवर्तित जातियों से ही थे ।एक इस्लामी नारे और पूजा पद्धति के अतिरिक्त उनका सब कुछ इसी मिट्टी का था।बृहत्तर मुस्लिम जगत के प्रति रहा सहा मोह तब टूट गया जब नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली ने अपने आक्रमणों के  समय अत्याचार करते समय भारतीय हिंदू और मुसलमान में कोई भेद नहीं किया।
राजनैतिक सत्ता में औरंगज़ेब के बाद एक शून्य उत्पन्न हो गया था।मराठा शक्तियों ने इस शून्य को पाटने की कोशिश की पर वह अपने अप्रासंगिक हो चुके तौर तरीकों की वज़ह से अब्दाली से पराज़ित हो बेहोश हो गयी ।ऐसे में यूरोप से आये व्यापारियों ने जिनकी समुद्र की लहरों से लोहा लेने वाली संघर्ष शक्ति ऊछालें मार रही थी ने इस शून्य को भर दिया। राजनैतिक ,बौद्धिक रूप से परास्त देश को कब्ज़े मे करने के लिये किसी विशेष कौशल की नहीं अपितु मौके का लाभ उठाने की चालाकी होना ही पर्याप्त थी जिसकी कोई कमी इन दूर देश से आये व्यापारियों में नहीं थी।१७५७ के प्लासी युद्ध से लेकर १८५७ के सिपाही विद्रोह तक एक भी दिन ऐसा नहीं है जब अंग्रेजों को इस बौद्धिक रूप से हारे हुये और राजनैतिक रूप से बिखरे भारत में संघर्ष ना करना पडा हो पर यूरोप के विषम वातावरण में पले और समुद्र जैसे उत्साह से लबरेज़ इन विदेशीयों मे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण और सैनिक अनुशासन अद्भुत था।बाबज़ूद इसके भारत देश ने समर्पण के बज़ाय एक बार मिलकर प्रयास करने का निश्चय किया और इक बार तो ऐसा लगा कि इन अंग्रेजों को जैसे सीमाओं के बाहर खदेड ही दिया हो ।पर अपने पुराने तौर तरीकों और परंपरागत सोच के चलते यह प्रयास विफल हुआ और साथ स्पष्ट हो गया कि पुरानी राजनैतिक व्यवस्था से ना तो अब सत्ता परिवर्तन संभव है और ना सांस्कृतिक पुनरूत्थान।१८५७ के विप्लव से अंग्रेजों को यह स्पष्ट हो गया कि केवल दमन और सत्ता के बल पर यहां राज करना संभव नहीं है तो भारत के निवासियों को भी समझ आ गया कि अब नये तौर तरीकों से ही लडना होगा।१८५७ के युद्ध को अगर जातिवादी चश्में से देखा जाये तो ब्राह्मण वर्ग पहली भार बौद्धिक से अधिक सैनिक रोल में नजर आता है ।मंगल पांडे से लेकर,लक्ष्मी बाई,नाना साहब पेशवा तात्या टोपे जैसे असंख्य देश भक्तों ने भले ही लडते समय अपनी जाति के बारे ना सोचा हो पर वे थे तो ब्राह्मण ही इससे इनकार करना इन्हें अपमानित करने जैसा है।
१८५७ के युद्ध में इटावा के कलेक्टर रहे ए०ओ०ह्यूम क्रांतिकारियों के हाथों मरते मरते बचे थे।उस दूरदर्शी अंग्रेज़ ने सोचा कि ऐसी विषम परिस्थिति उसके देश वासियों के समक्ष पुनः आ सकती है अतःसेवामुक्ति के त्काल बाद अपने देश ना जाकर उसने'इंडियन नेशनल कांग्रेस'के रूप में प्रेशर कुकर की सीटी जैसी व्यवस्था की जो असंतोष की भाप को निकालती रहे।इसके अतिरिक्त बहुत गंभीरता से अंग्रेजो ने काम किया।उन्हें सबसे ज़्यादा ताज़्ज़ुब तो इस बात का था कि जो हिंदू मुसलमान एक दूसरे के साथ खान-पान,रहन -सहन,नमाज़-पूज़ा में इतने विरोधी थे अंग्रेजों को निकाल बाहर करने के लिये एक हो गये।अतः सबसे पहले उन्होने ऐसे व्यक्तियों की तलाश शुरू की जो मुस्लिम समाज में उनके ऐज़ेंट के रूप में काम कर सकें ।सैयद अहमद खां के रूप में ज़ल्दी ही उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जो ना केवल अंग्रेजी शिक्षा का हिमायती था अपितु मुसलमानों के दिमाग में यह बात बिठाने को तैयार था कि वे शासक वर्ग के होने के कारण हिंदुओं से अलग और श्रेष्ठ हैं।इस तरह के अनेक ऐज़ेंट ना केवल हिंदू समाज और मुसलिम समाज में ढूंढे गये ,तैयार किये गये बल्कि सभी जातियों  और समुदायों की राजनैतिक महात्वाकांक्षा को हवा देकर निर्मित किये गये।पर भारत देश ने संघर्ष करना ना तो १७५७ से १८५७ के कालखंड में छोडा था और ना उसके बाद।नये-नये प्रयोगों को करते हुये १८५७ से १९४७ तक विविध रूपों मे चलता ही रहा।और अंततः १९४७ में अंग्रेजों को जाना ही पडा।पर वे जातियां जो सदैव सत्ता के लिये ललचाती तो थीं पर उसके लिये कोई मूल्य चुकाने को तैयार नहीं थीं,जो कभी बौद्ध धर्म में गयीं तो कभी मुसलमान हो गयीं उनकी लालची प्रवृत्ति को समझने में अंग्रेजों को जरा भी मुश्किल नही हुई और भीमराव अंबेडकर के रूप में उन्हें एक ऐज़ेंट इस समुदाय में भी मिल गया।अंग्रेजों की इस चाल को मोहनदास करमचंद गांधी जोकि स्वतंत्रता की लडाई के अगुवा बने थे ने विफल करने का निश्चय किया।इन उपेक्षित जातियों की सहज महात्वाकांक्षा को हवा दे कर मुसलमानों की तरह ही प्रथक निर्वाचन की मांग और जिसकी परिणिति अंततः विभाज़न में होनी थी को भांपकर गांधी ने आरक्षणवादी व्यवस्था को स्वीकार कर देश को कई टुकडों में बंटने से बचा लिया।
हिंदू धर्म जोकि युगों से राजनेतिक पराभव झेलते- झेलते अपने बौद्धिक चिंतन और आत्म शोधन की प्रक्रिया को भूल चुका था अंबेडकर को बौद्ध धर्म में जाने से नहीं रोक पाया ।धर्म परिवर्ति करते समय अंबेडकर के मस्तिष्क में निश्चित रूप से एक ओर तो निज़ी अनुभव थे तो दूसरी ओर अतीत के सबक भी मुसलमान बनने के बाद भी दलित कहलाने वाली जातियां सत्ता और सम्मान से वंचित ही रही थीं ।साथ ही प्रथक देश ले लेने के कारण मुसलमानों के प्रति जनमानस में स्थायी रूप से आ जाने वाले अलगाव को भी अंबेडकर पहचान गये थे ।अतः निजी कटुताओं के चलते हिंदू धर्म को छोड जाने का फैसला करने वाले अंबेडकर का यह फैसला कितना उचित था इसका निर्णय होना अभी शेष है।

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