Saturday, June 02, 2012

मित्रों प्रथम स्वातंत्रय समर-१८५७ में देश पर मिटने वाले सेनानायकों में राजा और नबाब तो शामिल थे ही मंगल पांडे और अहमदउल्लाशाह जैसे साधारण जन भी शामिल थे।भारतमाता के ये बेटे अपने त्याग -तप से बलिदान उन हज़ारों राजाओं नबावों से श्रेष्ठ बन गये जो या तो अंग्रेजों की गोद में बैट गये या ऊंट की करवट का इंतज़ार करने मे लगे रहे।इन्ही महान सपूतों में से एक था मौलवी अहमदउल्लाशाह।मौलवी अहमदउल्लाशाह के बारे में विलियम रसल ने लिखा है कि यदि मुझे इस युद्ध के तीन नायक चुनने हों तो मैं लक्ष्मीबाई,तात्या टोपे और मौलवी अममदउल्लाशाह को चुनूंगा।उसमें भी किसी एक का चुनाव करना हो तो मौलवी अहमदउल्लाशाह को चुनूंगा क्यों कि ना तो वह राज परिवार से आया था और ना ही उसकी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा।वह महान सेनानायक अपने ही एक मूर्ख देशवासी के हाथों ना मारा गया होता तो 


भारत में ब्रिटिश इतिहास कुछ और भी हो सकता थाभारतमाता के उस महान सपूत को समर्पित मेरी ये कविता मेरे आगामी काव्यसंग्रह"अग्निशर' में शामिल है।




आज़ादी की खातिर जिसने कुर्बां कर दी जान भी
आज कहानी सुना रहा हूं ऐसे वीर महान की
लंदन तक खलबली मचायी ज़र्रा-ज़र्रा कंपा दिया
एक बार तो अंगरेज़ों का लहू था जिसने ज़मा दिया
विलयम रसल ने सत्तावन का असली नायक जिसे कहा
अहमदउल्लाशाह'मौलवी' ज़ग में जिसका नाम हुआ
उसी मौलवी डंकाशाह की सुनो कहानी ध्यान से
आज़ादी ज़ियादा प्यारी थी जिसको अपनी जान से
सत्रह सौ सत्तावन में जब जीती ज़ंग पलासी की
हिंदुस्तान की आज़ादी को दी गोरों ने फांसी सी
बरस एक सौ के भीतर ही सारा देश गुलाम हुआ
किसी तरह भी राज्य हडपना अंगरेजों का काम हुआ
हिंदुस्तानी चाहे वह फिर राजा हो या सिपाही हो
ज़मींदार हो,कृषक भूमिपति भले पुरोहित नाई हो
सबको अपमानित कर गोरे  अक्सर खुशी मनाते थे
सरेआम कोडे लगवाते,वे ज़ूते चटवाते थे
पूज़ा और नमाज़ सिसकते गीत कोई कैसे गाता ?
घंटे,शंख,अज़ान सहमे थे ,रोती थी भारतमाता
भीतर-भीतर धधक रहा था पूरा हिंदुस्तान
प्राणों से भी ज़्यादा प्यारा होता स्वाभिमान
जाने कितने लाल देश के लगे जगाने ज़्वाला
मौलवी अहमदउल्लाशाह भी उनमें था मतवाला
अपने वली का हुक्म मानकर गये हुये थे वे ईराक
दूर देश में पहुंच चुकी थी ,उनकी शोहरत उनकी धाक
करके अमर शहीदों को सिज़दा ज़्यों ही कर्बला से निकले
कानों में ज़्यों गूंज़ उठी--कुछ तो तू हम से सिख ले
हज़रत ने भी फरमाया है इसमें कोई झोल नहीं
वतन और मज़हब से बढ के इस जीवन का मोल नहीं
जाने कितनी आवाज़ें फिर गूंज़ उठीं मन के भीतर
फर-फर ज़्यों करते हों कमरे के भीतर तीतर
मिलता नहीं था चैन कहीं भी,कोई बोला लौट चलें
अपनी धरती पर ही शायद मिले रोशनी दीप जलें
फौरन ही चल पडे रात-दिन आ पहुंचे थे वे मुल्तान
थके कदम फिर उछल पडे आयी उनमें नूतन जान
करूं शुक्रिया अदा खुदा का,मुल्क धरती दिखलाई
हिंदुस्तानी मुसलमान की आंख थी सहसा भर आई
उठा-पटक मचने वाली थी कसके हिंदुस्तान में
जब फकीर था याद कर रहा अल्लाह को मुल्तान में
मस्ज़िद में सोये थे गहरी नींद से कोई जगा गया
कान के पर्दों पर ज्यों कोई डंका जैसा बजा गया
उठ जा वतन पुकार रहा है,उठ कर ऐसी ज़ंग कर
इन ज़ुल्मीं कायर अंगरेजों के घमंड को भंग कर
दिखला दे रस्ता तू इनको सात समंदर पार का
या फिर मज़ा चखा दे इनको ऐसी करारी हार का
सरज़मीन पर हिंदोस्तां की बाकी रह न सकें अगरेज़
डंकाशाह उठो ललकारो सात समंदर पार दो भेज़
सुनकर यह ललकार हडबडा उठे नींद से डंकाशाह
आसपास था नहीं कहीं कुछ हैरत में पड गये थे शाह
अल्लाह का फरमान समझकर कूच की तैयारी कर दी
चंआज़ादी की खातिर जिसने कुर्बां कर दी जान भी
आज कहानी सुना रहा हूं ऐसे वीर महान की
लंदन तक खलबली मचायी ज़र्रा-ज़र्रा कंपा दिया
एक बार तो अंगरेज़ों का लहू था जिसने ज़मा दिया
विलयम रसल ने सत्तावन का असली नायक जिसे कहा
अहमदउल्लाशाह'मौलवी' ज़ग में जिसका नाम हुआ
उसी मौलवी डंकाशाह की सुनो कहानी ध्यान से
आज़ादी ज़ियादा प्यारी थी जिसको अपनी जान से
सत्रह सौ सत्तावन में जब जीती ज़ंग पलासी की
हिंदुस्तान की आज़ादी को दी गोरों ने फांसी सी
बरस एक सौ के भीतर ही सारा देश गुलाम हुआ
किसी तरह भी राज्य हडपना अंगरेजों का काम हुआ
हिंदुस्तानी चाहे वह फिर राजा हो या सिपाही हो
ज़मींदार हो,कृषक भूमिपति भले पुरोहित नाई हो
सबको अपमानित कर गोरे  अक्सर खुशी मनाते थे
सरेआम कोडे लगवाते,वे ज़ूते चटवाते थे
पूज़ा और नमाज़ सिसकते गीत कोई कैसे गाता ?
घंटे,शंख,अज़ान सहमे थे ,रोती थी भारतमाता
भीतर-भीतर धधक रहा था पूरा हिंदुस्तान
प्राणों से भी ज़्यादा प्यारा होता स्वाभिमान
जाने कितने लाल देश के लगे जगाने ज़्वाला
मौलवी अहमदउल्लाशाह भी उनमें था मतवाला
अपने वली का हुक्म मानकर गये हुये थे वे ईराक
दूर देश में पहुंच चुकी थी ,उनकी शोहरत उनकी धाक
करके अमर शहीदों को सिज़दा ज़्यों ही कर्बला से निकले
कानों में ज़्यों गूंज़ उठी--कुछ तो तू हम से सिख ले
हज़रत ने भी फरमाया है इसमें कोई झोल नहीं
वतन और मज़हब से बढ के इस जीवन का मोल नहीं
जाने कितनी आवाज़ें फिर गूंज़ उठीं मन के भीतर
फर-फर ज़्यों करते हों कमरे के भीतर तीतर
मिलता नहीं था चैन कहीं भी,कोई बोला लौट चलें
अपनी धरती पर ही शायद मिले रोशनी दीप जलें
फौरन ही चल पडे रात-दिन आ पहुंचे थे वे मुल्तान
थके कदम फिर उछल पडे आयी उनमें नूतन जान
करूं शुक्रिया अदा खुदा का,मुल्क धरती दिखलाई
हिंदुस्तानी मुसलमान की आंख थी सहसा भर आई
उठा-पटक मचने वाली थी कसके हिंदुस्तान में
जब फकीर था याद कर रहा अल्लाह को मुल्तान में
मस्ज़िद में सोये थे गहरी नींद से कोई जगा गया
कान के पर्दों पर ज्यों कोई डंका जैसा बजा गया
उठ जा वतन पुकार रहा है,उठ कर ऐसी ज़ंग कर
इन ज़ुल्मीं कायर अंगरेजों के घमंड को भंग कर
दिखला दे रस्ता तू इनको सात समंदर पार का
या फिर मज़ा चखा दे इनको ऐसी करारी हार का
सरज़मीन पर हिंदोस्तां की बाकी रह न सकें अगरेज़
डंकाशाह उठो ललकारो सात समंदर पार दो भेज़
सुनकर यह ललकार हडबडा उठे नींद से डंकाशाह
आसपास था नहीं कहीं कुछ हैरत में पड गये थे शाह
अल्लाह का फरमान समझकर कूच की तैयारी कर दी
बंटी रोटियां,कमल बंट रहे,बंटने लगे पत्र हर ओर
नगर, गांव,चौपाल,खेत में जुटने लगे मित्र हर ओर
दिल्ली, आगरा और बरेली में सुलगाई चिनगारी
कलकत्ते से पेशावर तक सारी छावनीं मथ डाली
अवध क्षेत्र के सैनिक सारे अपमानित थे क्षोभित थे
वाज़िद शाह के साथ हुआ जो जान के सारे क्रोधित थे
किया फैसला अवध में रहकर मुझे संगठन करना है
हिंदू-मुसलमान के मन में साहस -शौर्य को भरना है
घूम घाम के चंद दिनों में मौलवी पहुंचे फैज़ाबाद
गली-गली में धूम मच गयी,हिंदू-मुस्लिम ज़िंदाबाद
ज़िंदाबाद के इन नारों से जाग उठे सारे अंगरेज
सिटी कमिश्नर ने सराय में चार सिपाही दिये थे भेज
उस फकीर के ओज-तेज को देख फिरंगी धाये थे
मस्ज़िद से नमाज़ पढकर के अभी मौलवी आये थे
लेफ्टीनेंट थरबर्न स्वयं अब पूरी फौज लेकर आया
मामूली फकीर से शासन मन ही मन था घबराया
ज़ोर-ज़बरदस्ती की फिर तो शहर में दंगा भडक उठा
वतनपरस्त मौलवी सहसा गुस्से में था कडक उठा
"मारो-पकडो-काटो इनको,   हिंदोस्तां से दूर करो
अगरेज़ों अपनी करनी का फल तुम अपने आप भरो"
चमक उठीं तलवारें फिर तो ज़ख्मी हो थरबर्न गिरा
भागे थे अंगरेज सिपाही अपनी-अपनी पीठ फिरा
कर्फ्यू फौरन लगा शहर में फौज ने था घेरा डाला
मन ही मन कुछ सोचा समझा,जाने क्या देखा-भाला?
गिरफ्तार हो गये स्वयं ही,यह तो इक बहाना था
असली चमत्कार तो उनको अपना अभी दिखाना था
बना कमीशन ,चला मुकदमा,जेल अदालत में बदली
इस अंगरेजी नौटंकी ने दो दिन में सूरत बदली
हुक्म सुनाया  था फांसी का,बागी उनको बतलाया
जेल डाक्टर आगे बढकर उन्हें बचाने को आया
नज़फ अली ने कहा कोर्ट से -'यह बेहद बीमार है
जब तक स्वस्थ नही हो जाता,जीने का अधिकार है"
हो गये भरती अस्पताल में वहां वे गंडे देते थे
बीमारों को फूंक मारकर वे  चंगा कर देते थे
मंगल पांडे फूंक चुके थे उधर बिगुल संग्राम का
मेरठ में,दिल्ली में, अवध में मचने लगा कोहराम था
व्यूह रचना की भूमि बन गयी फैज़ाबाद की जेल
जेल के भीतर बैठे-बैठे रचें मौलवी खेल
बीती मई जून आया है भडक उठी है ज्वाला
जेल के भीतर आखिर कब तक रहता वह मतवाला
आठ जून की रात को निकले तोड के वे सारे बंदन
अंगरेजों के घरों के भीतर मचा हुआ था क्रंदन
नगर लखनऊ में फूंक चुकी थीं बेगम रण की भेरी
अंग्रेज़ों के मान-मर्दन में नहीं थी  ज़्यादा देरी
आज़ादी के दीवानों ने चिनहट में डेरा डाला
मौलवी अहमदउल्लाशाह ने मोरचे को देखा भाला
आया मौलवी सेना लेकर -सुन गबिंस था घबराया
रेज़ीडेंसी के भीतर अब गहरा मातम छाया था
कैसे करें?करें क्या आखिर गोरे तय ना कर पाये
मौलवी साहब धीरे-धीरे आगे तक बढते आये
तीस जून सन सत्तावन को चला हेनरी सेना ले
पीछे हटते गये मौलवी मानों डरकर सेना से
समझें ,सम्हलें जब तक गोरे तब तक तोपें गरज़ उठीं
चलीं गोलियां बंदूकों से तलवारें थीं लरज़ उठीं
कर्नल केज़ गिरा धरती पर मरा बसानों गोली से
घोडे से गिर गया मैक्लीन भागा हेनरी टोली से
दो सौ गोरे मरे डेढ सौ घायल थे लाचार थे
रेज़ीडेंसी तक सीमित थे जोकि अवध सरकार थे
डंकाशाह के नाम का डंका बज़ा मैदान-ए-ज़ग में
किंतु ,मौलवी नहीं खोये थे क्षणिक विजय की तरंग में
तारों वाली कोठी में फिर उन्होनें डेरा ज़मा दिया
हफ्ते भर के भीतर ही   फिर ऐलाने-ज़ंग किया
तोप के गोल दहक उठे थे कांप उठी रेज़ीडेंसी
गोरी मेमें कांप उठी थीं,कांप उठे एक्सीलेंसी
हुआ धमाका टूट गयी थी रेज़ीडेंसी की दीवार
आज मौलवी की फौज़ों से गोरों ने फिर पायी हार
लेकिन ,कुछ अहमक लोगों ने बेगम को बडकाया है
"मौलवी अहमदशाह अवध पर कब्ज़ा करने आया है"
खबर मिली अहमदउल्ला  को उनको बेहद रंज़ हुआ
उनकी देशभक्ति के ऊपर ऐसा करारा तंज़ हुआ
मम्मू खान के गुर्गों ने ओछी हरकत कर डाली थी
डंकाशाह की फौज़ के सम्मुख डंकाशाह को गाली दी
निकल पडीं तलवारें फिर तो मचा हर तरफ भीषण शोर
जब तक मौलवी फौज़ को रोंकें लाशें बिछ गयीं चारों ओर
ओछी चालें देख मौलवी अलग हो गये बेगम से
रोम-रोम में आग लगी थी धधक रहे थे वे गम से
लेकिन मातृभूमि की खातिर गम-गुस्से को झेल गये
चौदह जनवरी अट्ठावन को वे प्राणों पर खेल गये
छोटी सी टुकडी लेकर     वे औट्रम पर टूटे थे
जनरल औट्रम किस्मत से ही काल-गाल से छूटे थे
डंकाशाह ने झडी लगा दी फिर तो भीषण हमलों की
लगी उखडने गोरी     फौज़ें जैसे बेलें गमलों की
पंद्रह से पच्चीस फरवरी तक हमले थे छार किये
हुये अपाहिज़ जाने कितने दो सौ जान से मार दिये
दुनिया भर की गोरी फौज़ें शहर लखनऊ ओर चलीं
कैंपबेल औ होपग्रांट की मौतें कितनी बार टलीं
छोड चले जब सभी लखनऊ डटे रहे बस डंकाशाह
डंकाशाह के नाम से गोरे भरने लगते थे गहरी आह
छोड चले लखनऊ अंत में ,मगर लडाई ज़ारी थी
होपग्रांट की होप मिटने की अब 'बारी' में बारी थी
होपग्रांट हो गया पराज़ित लेकिन गुरखे आ पहुंचे
चले बिठौली ओर मौलवी नगर शाहज़हांपुर पहुंचे
नाना साहब यहां आ मिले ,मिले भुज़ाओं में भरकर
एक बार फिर ज़ंग छिड गयी भागा वालपौल डरकर
कैंपवेल ने चारों ओर से फिर उनका घेरा डाला
जोंस,हेल,कैंपवेल सभी का पडा मौलवी से पाला
जब तक गोरे घेरा कसते रूइया पहुंचे डंकाशाह
एक बार फिर निकल रही थी होपग्रांट के मुख से आह
बार-बार घेरा होता था निकल मौलवी जाते थे
अंग्रेज़ों के सपनों में भी रोज़ मौलवी आते थे
कोलिन,औट्रम,होपग्रांट सोते-सोते चिल्लाते थे
आंखें बंद ,हाथ में जूते , मीलों भागे जाते थे
आया मौलवी आया मौलवी का हल्ला मच जाता था
गोरों के खेमों में मातम अक्सर ही मन जाता था
बदल चुका था क्रांति दृश्य, अब गोरों की बारी थी
गद्दारों के कारण हमने जीती बाज़ी हारी थी
अहमदउल्लाशाह जुटाने लगे थे फिर सेना भारी
अंतिम युद्ध बने निर्णायक करने लगे थे तैयारी
जिसमें जरा भी आग दीखती उसे ज़गाने जाते थे
छोटे-छोटे राजाओं से मिलकर मदद जुटाते थे
नगर पुवायां के राजा को पाती उन्होने भिज़वायी
राजपूत हो लडो देशहित,लड मरने की बेला आयी
वीर मौलवी समझ न पाये यह कायर है मक्कार है
छिपा सिंह की खाल में गीदड,ढोंगी है,गद्दार  है
बोला राजा आओ  अकेले में मिल चर्चा करते हैं
आये हो तुम वतन की खातिर हम भी वतन पे मरते हैं
हाथी पर चढ चले मौलवी बजने लगी नौबत बाजे
पहुंचे ज्यों ही पास गढी के बंद हुये सब दरवाजे
डंकाशाह का माथा ठनका होती दिखती गद्दारी
तोडो-तोडो दरवाजे को घात किया कस कर भारी
धांय-धांय कर चलीं गोलियां वार किया था पीछे से
छत से गोली चला रहा था ,तलवारें थीं नीचे से
राजा के कायर भाई ने शीश मौलवी का काट लिया
गद्दारों की प्रथम पंक्ति में अधम मूर्ख ने नाम किया
उम्मीदें बुझ गयीं देश की भारतमाता बिलख उठी
आज तलक शर्मिंदा पुवायां की निगाह हैं नहीं उठी
आज़ादी के दीवानों के नायक बन गये अहमदशाह
युगों युगों तक तेरी कीर्ति का डंका बज़ेगा डंकाशाह
  -------------------(प्रकाशनाधीन काव्य संग्रह"अग्निशर" से)

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