भीड
भीड
अस्पताल हो या रेलवे
रिजर्वेशन का काउंटर
हर तरफ भीड ही भीड है
भीड की आंखों में है
बेरोज़गारी,कुंठा ,लाचारी
इलेक्शन का दौर है
हर तरफ बज रहा है
राग दरबारी
पार्टियों के घोषणा पत्र और
मुखपत्र
कर रहे हैं
सरकार के कर्मों एवं दुष्कर्मों
का गान
सभी कर रहे हैं भीड को सावधान
भीड के सभी हैं शुभचिंतक
भीड का ही है सम्मान
लोकतंत्र के ठेकेदारों की
प्राणवायु है भीड
भीड ही भगवान है
फिर भी कोई बनना नहीं चाहता
भीड का हिस्सा
भीड से अलग दिखने के लिये ही सब
भीड जुटाते हैं
भीड के आगे
रोते हैं ,नाचते हैं ,गाते
हैं
हर मुमकिन तरीके से भीड को
रिझाते हैं
भीड को अपने तरीके से चलाना
चाहते हैं
पर,अब भीड भी
अपना मूल्य जान गयी
अपने ठेकेदारों की नीयत पहचानती
है
वह उनके इशारों पर ताली तो बजाती
है
पर किसी भी सभा में मुफ्त नहीं
आती है
भीड को पता है कि यही मौसम है
बैंकों के लाकर खुलने का
काली कमाई से कुछ मिलने का
इसके सहारे कट जायेगा महीना,दस
दिन
फिर वही गलीज़ ज़िंदगी
पैर में चुभती रहेगी बेरोज़गारी
और अभाव की पिन
चार दिन की चांदनी के बाद फिर
छा जायेगा अंधकार और कुहासा
सचमुच भीड को हमेशा रहती है
ज़ल्दी चुनाव होने की आशा
भीड के लिये राजनीतिक स्थिरता का
कोई अर्थ नहीं है
क्योंकि भीड को पता है
कोई भी पार्टी आये सत्ता में
उसके हालात में नही पडेगा फर्क
वह सिर्फ ताली बजाने के काम आती
है
बना देती है रंको को राजा
पर स्वयं भीड ही रह जाती है।
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