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मित्र ,हमारे संबंधों में ऐसे पल आये

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हाय,हैलो के बाद कहें क्या? समझ नही पाये मित्र ,हमारे संबंध ों में ऐसे पल आये कुशल-क्षेम ,हारी-मज़बूरी दर्द नहीं पूंछे जीवन-रस के पात्र हो गये असमय ही छूंछे अवसादी-घन उमड -घुमड मन आंगन पर छाये मित्र ,हमारे संबंधों में ऐसे पल आये घंटे,दिन,सप्ताह,महीने बरसों बीत गये आंखें नहीं ह्रदय भी अपने बिलकुल रीत गये स्वर,लय,गति,आवाज़ गये सब गीत कौन गाये? मित्र ,हमारे संबंधों में ऐसे पल आये बिला-वज़ह हम तुम रूठे थे कल की ही है बात दुःस्वप्न बन गयी ज़िंदगी जैसे काली रात कुछ तो करो उपाय कि फिर से सुप्रभात आये---। -----------------अरविंद पथिक

ओछे मंच नहीं

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हमको तो लिखना आता है दिखना रंच नहीं बस थोडा आशीष चाहिये ओछे मंच नहीं अपने निकम्मेपन पर हमको है पूरा विश्वास  सिर्फ भरोसा है ईश्वर का नहीं किसी से आस मेरी उनकी ठनी हुई है कोई पंच नहीं बस थोडा आशीष चाहिये ओछे मंच नहीं हमें तोडने को बौने हैं सारे एक हुये वही कुचलने हमें चले हैं जिनके चरण छूये मन आहत,स्तब्ध-मौन पर ईर्ष्या रंच नहीं बस थोडा आशीष चाहिये ओछे मंच नहीं लक्षागृहों में आग लगायी चक्रव्यूह तोडे षडयंत्री धाराओं के रूख बहुत बार मोडे आते हैं पर हमको रूचते तनिक प्रपंच नहीं बस थोडा आशीष चाहिये ओछे मंच नहीं -------------अरविंद पथिक

'सोशल मीडिया'सूचना और आत्मप्रचार का माध्यम है

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पिछले दिनो एक चैनल ने ' सोशल मीडिया ' की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर बहस करायी और जैसा कि इन चैनलों की बहस में होता है कि कुछ लोग मुद्दे के पक्ष में और कुछ विपक्ष में सिर्फ इसलिये बोल रहे थे चूंकि चीखने से ही चैनल्स की बहस को शायद विचारोत्तेजक और टी आर पी गेनर माना जाने लगा है।बहस का निष्कर्ष भी जैसे पू्र्वनियोजित था कि कोई ऐसी व्यवस्था ज़रूर होनी चाहिये जो ' सोशल मीडिया ' के कंटेंट को नियंत्रित कर सके। मुझे लगता है कि जिस तरह से मीडिया के लोग कहते हैं कि आत्मनियंत्रण ही मीडिया ( इलेक्ट्रानिक और प्रिंट ) के लिये श्रेष्ठ है वही बात ' सोशल मीडिया ' पर भी लागू होती है पर क्या इतने उच्च स्तर की नैतिकता है समाज में जो सही अर्थों में ' आत्मनियंत्रण ' कर सके।बनिये ( वह बनिया अंबानी से लेकर दाउद और नौसिखिया बिलडर से लेकर रूपर्ट मर्डोक तक ) के पैसों ( विज्ञापन और पेड न्यूज ) से चलने वाला तथाकथित मुख्यधारा मीडिय...

हिंदी फिल्मों में स्वास्थ्य हमेशा महत्वपूर्ण विषयवस्तु रहा है

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हिंदी फिल्मों ने अपने प्रारंभिक काल से ही मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों की भर्त्सना और सांस्कृतिक उन्नयन के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित की तो स्वास्थ्य जैसे जीवन को गहरे तक प्रभावित करने वाले विषयों को भि सेलूलाइड पर उतारने में कोताह ी नहीं बरती है।चाहें वह ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का ज़माना हो या फिर रंगीन फिल्मों का हिंदी फिल्मों में स्वास्थ्य हमेशा महत्वपूर्ण विषयवस्तु रहा है।स्वास्थ्य से जुडे भावनात्मक और सामाजिक पक्ष को हिंदी फिल्मों मे पूरी गंभीरता से चित्रत किया जाता रहा है। इस क्रम मे १९७० मे रिलीज हुई 'खिलौना' एक उल्लेखनीय फिल्म है।फिल्म की मुख्य भूमिकाओं मे संजीव कुमार और मुमताज ने अपने अभिनय की जिन ऊंचाइयों को छुआ उसके लिये आज भी इस फिल्म की चर्चा की जाती है। फिल्म का कथानक विजयकमल (संजीव कुमार) जोकि ठाकुर सूरज सिंह (विपिन गुप्ता) का बेटा है,के इर्द-गिर्द घूमता है।विजयकमल अपनी प्रेमिका सपना की शादी बिहारी (शत्रुघन सिन्हा) के साथ होने और दीवाली की रात सपना के आत्महत्या कर लेने के कारण ,पागल हो जाता है। ठाकुर सूरज सिंह को विश्वास है कि शादी के बाद विजयकमल ठीक...

--शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम---------------------------------।

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मित्रों एक तरफ संसद में बलात्कार विरोधी बिल पास हो रहा है तो दूसरी ओर देश में ऐसी शर्मनाक घटनाओं की बाढ आयी हुई है।अभी मुश्किल से २ महीने गुजरे हैं 'दामिनी कांड'को कि अनगिनत घटनाओं के बीच बिल्कुल वैसी ही घटना चंडीगढ में हो गयी।राजधानी समेत देश के अधिकांश महानगरों में ,सरकारी कार्यालयों में जिस तरह से छेडछाड ,बलात्कार और शोषण की ये घटना हो रही हैं उससे तो लगता नही कि नये पुराने किसी भी कानून का खौफ इस पाशविक सोच के राक्षसों में है।कई बार तो ये लगता है कि कहीं राजधानी में हुये 'दामिनी कांड' के प्रतिकार में जो गुस्सा लोगों में दिखा कहीं वह भी प्रायोजित तो नहीं था वरना निंदनीय घटनाओं की इन बौछारों के बीच नारी संगठनों ,मानवाधिकार और महिला अधिकारों की दुहाई देने वाले मीडिया संगठनों की आवाज नक्कार खाने की तूती से ज़्यादा नहीं साबित हो रही।कोई जन सैलाब नहीं उमड रहा।लोकसभा में हमारे सांसदों की संख्या और बहस का स्तर भी बताता है कि कितने संज़ीदा हैं हम इस मामले में।अभी पिछले दिनों आकाशवाणी में हुये ऐसे ही घटनाक्रम पर जिस तरह से लीपापोती की गयी और सोशल मीडिया ने कोल्ड रिस्पांस द...

।ईश्वर करे मेरा आकलन गलत निकले।

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मित्रों मुझे कई बार शक होता है कि इस देश का मुसलमान स्वयं को इनसान मानता भी है या नही।कल मेरे एक मित्र जो बडे पायेदार शायर और बेहतरीन इनसान हैम और जिनकी मैं बडी इज़्ज़त करता हूं एकाएक कह उठे भाई मुसलमान होने की वज़ह से ही लोग मुझे कवि सम्मेलनों में नहीं बुलाते जबकि मैं उर्दू से बेहतर कविता हिंदी में करता हूं।उनकी यह बात सुनकर मुझे झटका लगा ।मैं सोचता रहा बशीर बद्र,मुनव्वर राना,राहत इंदौरी ,वसीम बरेलवी समेत उर्दू के जो भी बडे शायर हैं सभी को तो हम पूरे प्यार से ,इज्जत के साथ सुनते हैं और सराहते है ,शोहरत और धन से नवाज़ते हैं ।इनकी शायरी के लिये वाह-वाह करते कभी ये खयाल नही आता कि ये हिंदू की शायरी है या मुसलमान की ।कभी किसी मुनव्वर राना और गोपालदास नीरज की कविता सुनते हुये तारीफ का पैमाना उनका मज़हब नही होता या फिर ये बात आयी कहां से।मैं खंडवा के अपने मित्र आलोक सेठी को जानता हूं जो मुनव्वर राना के बडे फैन हैं और ना जाने कितनी बार उन्हें बुला चुके हैं ।ऐसे ही गाज़ियाबाद के हमारे एक मित्र संयोजक थे जिनके लिये कवि-सम्मेलन-मुशायरे का मतलब ही बशीर बदर का काव्यपाठ होता है।ऐसे में जब कोई श...

अधिकांश मूर्ख और घमंडी अधिकारी स्वयं को आज भी किसी खुदा से कम नही समझते हैं।

मित्रों पिछले कुछ दिनों से महिलाये और उसमें भी विशेष रुप से दिल्ली की महिलाओं ने शोषण उत्पीडन का जो दौरदेखा है उसके समापन की कोई संभावना दूर-दूर तक दिखायी नहीं पड रही।१६ दिसंबर की शर्मनाक घटना के बाद जिस तरह से नारी उत्पीडन की घटनायें सामने आयीं उसमें नया प्रकरण आकाशवाणी दिल्ली का है।आकाशवाणी एफ एम चैनल के एक प्रस्तोता के साथ पिछले दिनों उसके एक सहकर्मी ने दुरएव्यवहार किया और जब उस महिला ने अपने 'बास' से एस घटना की शिकायत की तो उन्होने कहा--"इसमें बुरा मानने जैसी क्या बात है? आगे बढने के लिये तो ये सब करना ही पडता है।मेरी पत्नी तो कहती है कि 'हग' करने तक तो कुछ भी आपत्तिजनक नहीं होता।" पीडिता ने इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से भी कर दी है और एक उच्चस्तरीय कमेटी इस घटना की जांच के लिये गठित की जा चुकी है पर ये श्रीमान जी इस सबसे बेपरवाह कल भी आफिस टाइम में 'इंडिया इंटरनेशनल' में एक कार्यक्रम में विराजमान थे।उनके आश्वस्त और बेपरवाह होने का कारण भी है क्योंकि उनके फेवरिट १२ साहित्यकारों का वरद हस्त जो उन पर है। भ्रष्टाचार,कदाचार और अनाचार का गढ ब चुके आ...