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प्रिये मुझको स्वार्थी होने का यों इलज़ाम ना दे

वर्ष १९९८ में लिखा गया और मेरे दूसरे गीत संग्रह 'अक्षांश अनुभुतियों के' में प्रकाशित-- प्रिये मुझको स्वार्थी होने का यों इलज़ाम ना दे देना है तो प्यार से दे ,वरना रिसकर ज़ाम ना दे मान तू रखती है तो रख पर मेरा अपमान मत कर प्यार की इस पीर को सिर्फ मेरे नाम मत कर मान रखने को तेरा मैने सदा तुझको मनाया सिर्फ मन रखने को ही तू एक दिन मुझको मना ले प्रिये मुझको स्वार्थी होने का यों इलज़ाम ना दे स्वप्न की सृष्टि रचाई पर स्वयं रीता रहा हूं सुधा दी सबको ही मैने ,गरल खुदा पीता रहा हूं गीत मेरे सब तुम्हारे हैं ,मेरा कुछ भी नहीं है फिर भी मुझको स्वार्थी कहना प्रिये कितना सही है? मेरे निश्छल प्यार को तू स्वार्थ का तो नाम ना दे प्रिये मुझको स्वार्थी होने का यों इलज़ाम ना दे क्या कहा कि प्रेम में तुमने ही केवल दर्द पाया? चैन खोया ,नींद खोयी,ह्रदय भी अपना गंवाया प्रेम के इस यज्ञ में मैं भी समर्पित हो चुका हूं चैन क्या औ नींद क्या ? मैं खुद ही अर्पित हो चुका हूं यज्ञ की इस भस्म को तू धूलि का तो नाम ना दे प्रिये मुझको स्वार्थी होने का यों इलज़ाम ना दे देना है तो प्यार से दे ,वरना ...

maulvi ahamadullshah

१८५७ के १५० वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय प्रसारण सेवा,आकाशवाणी ने प्रथम स्वातंत्रय समर के क्रांतिकारियों पर रेडियो रूपक की श्रंखला प्रसारित की।पुवायां ,शाहजहांपुर का होने के कारण मौलवी अहमदउल्लाशाह के बारे में सुन रखा था पर अब सिलसिलेवार पढा।तो आश्चर्य में पड गया----विलियम रसल जोकि 'उस क्रांति के समय 'ब्रिटिश फौज़ ' में था और बाद में 'लंदन टाइम्स ' का संवाददाता बना --उसने लिखा-----इस युद्ध के तीन म हान सेनानायक थे भारतीय सेना के---प्रथम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई,दूसरे तात्या टोपे और तीसरा मौलवी अहमदुल्लाशाह -इन तीनों में भी मैं मौलवी को प्रथम स्थान पर रखना चाहूंगा-क्योंकि वह ना तो किसी राजपरिवार में पैदा हुआ था और ना ही उसने कोई विधिवत सैन्य शिक्षा ली थी फिर भी उसकी रणनीतियों ने कई बार अंग्रेज जनरलों को चौंकाया।" ---इन्ही मौलवी अहमदुल्लाशाह के बारे में --विनायाक दामोदर सावरकर ने लिखा----"-------------उस महान सेनानी को इस देश के एक देशद्रोही ने छल से मार दिया,पोवेन(पुवायां)का यह राजा छोटा और मूर्ख तो था ही नराधम था--------। ऐसे मौलवी अहमदुल्...

बिलकुल अभी अभी लिखा गया गीत।

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मन जब नहीं नहीं कहता है ,क्या हम बात करें? मन की मानें चलो आज से,नव शुरूआत करें, मन की तुमने बहुत दिनों से सुनी-अनसुनी की मन की बातोंकी तो तुमने बहुधा आहुति दी चलो आज अपने ही मन से मन की बात करें मन की मानें चलो आज से नव शुरूआत करें मन को मनमानी से रोका-टोका खुद को छला गुणा-भाग के प्रस्तर खंडों से मन को कुचला दमित-शमित-आहत घायल पर और न घात करें मन की मानें चलो आज से,नव शुरूआत करे कितने सुंदर दिन थे जब हममनमानी करते थे और हमारी मनमानी से सभी डरा करते थे वैसी ही नासमझी की फिर कोई बात करें मन की मानें चलो आज से,नव शुरूआत करे देखो कितना रीत गये हैं मन की ना करके हार चुके हैं कदम-कदम पर अर्थहीन गुनके बंदिश तोडें आओ सारी मन की बात करें मन की मानें चलो आज से,नव शुरूआत करे। --अरविंद पथिक

दिन-प्रतिदिन ही गिर रहा रूपया और चरित्र

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पिछले दिनो रूपये ने डालर के सम्मुख जैसे सरेंडर किया वैसा तो मनमोहन सिंह ने सोनिया जी के आगे भी नही किया।यों तो रूपया आज़ादी के बाद से ही नेताओं के चरित्र की तरह गिरता ही जा रहा है पर शायद पिछले कुछ दिनो से वह नेताओं के चरित्र पर गौर करना ही भूल गया था वरना मधु कोडा,लालू यादव,ए राजा,कलमाडी जैसे खिलाडियों ने बराबर प्रेरित किया था गिरने को पर रूपये ने अपने को शायद नेताओं के चरित्र के बजाय आम आदमी के चरित्र से जोड लिया था सो कमोवेश स्थिर रह।पर यथा राजा तथा प्रजा आखिर आम आदमी को भी सुध आयी अरे हमारा चरित्र स्थिर क्यों?अन्ना और आप के चक्कर में ये तो बस चेंज चेंज चिल्ला रहा है।टोपी पहनाने के युग में टोपी लगा रहा है।फिर क्या आम आदमी ने फटाफट कुछ दर्ज़न बलात्कार कर डाले निर्भया-और आसाराम कांड को देख सुनकर रूपये को यथास्थिति का आभास हुआ ।उसने सहारे के लिये नेताओं की ओर देखा तो वे कहीं नोएडा तो कहीं मुज़फ्फर नगर बनाने में लगे थे।अब रूपया करता तो क्या करता लगा फिसलने और ऐसा फिसला कि उसकी फिसलन पर मोईली की ज़ुबान फिसली बेचारों ने पेट्रोल पंप रात में बंद करने की इच्छा भर जताई कि दिग्...

---------------चेतना की भीतरी पर्तों में सुरक्षित ,गांधी

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आज गांधी जयंती है।कई स्कूलों कालेजो में अवकाश है तो कई बंद हैं।गांधी की उपस्थिति हम चाहे अनचाहे महसूस करते हैं और गांधि का विरोध या समर्थन करने को विवश होते हैं।यही गांधी की जीत है गांधी को खारिज़ नही किया जा सकता।दरअसल गांधी व्यक्ति और विचार से आगे हैं वह क्रियाशील विचार हैं।बहुत सी चीजें जो केवल भाषण की और तालियां बजवाने की चीजे होती थी उन्हे व्यवहार में उतार लाना गांधी के बूते की ही बात थी।असर सदैव आचरण का होता है शब्दों का नहीं।भाषण वीर तो गांधि के काल में भी बहुत थे।पर वचन को व्यवहार में उतार लेने वाला ना तब था और ना अब।एक गांधी ही थे कि नफरत के दौर में शांति की प्रेम की बात करने के लिये सबसे पहले प्राण देने के लिये खडे हो जाते थे।दक्षिण अफ्रीका से लेकर चंपारण और नोआखाली तक कोई साथ दे तो और कोई साथ न दे तो भी शांति के लिये अमन के लिये और न्याय के लिये मर मिटने को तत्पर गांधी मौज़ूद मिलते हैं।आलोचना तो लोग राम और कृष्ण की भी करते हैं,पैगम्बर और रसूल की भी करते हैं,अपने निजी बाप की भी करते हैं तो गांधी कि क्यों नहीं करेंगे? जिन्होनें अपने जीवन में एक नाखुन का भि अपनी मरज़ी से त्याग नह...

दुनिया में सबसे अच्छी, हिंदी ही अपनी भाषा है

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दुनिया में सबसे अच्छी, हिंदी ही अपनी भाषा है रसखान ,रहीम,तुलसी,कबीर की, वाणी है -अभिलाषा है लेकर के सबको साथ चली हिंदी का किसी से वैर नहीं अवधी,ब्रज,कन्नौजी,बैसवारी,अंगिका अंग ह ैं हिंदी के खुसरो की तूती से लेकर,हिंगलिशी रंग हैं हिंदी के अग्रेज़ी,चीनी,रशियन ,अरबी सब छूट गयीं मीलों पीछे अपनी मिठास से हिंदी ने कामिल-बुल्के से रिषि खींचे हिंदी आज़ादी का साधन,समरांगण का हथियार बनी बिस्मिल ,सुभाष के गांधी के संघर्षों का आधार बनी जैसा कहते वैसा लिखते,वैसा ही दिखते हिंदी में लप्त,गप्त से मुक्त सदा सीधा लिखते हैं हिंदी में चौपाल से लेकर राष्ट्र संघ की बोली वानी हिंदी हो ज्ञान-विज्ञान अनुशासन की शासन की भाषा हिंदी हो केवल हिंदी का दिवस नही हो वर्ष समूचा हिंदी का स्थान वही हो दुनिया में होता जा माथे की बिंदी का दुंदुभि बजे दुनिया भर में हिंदी की ,हिंदी वालो की है यही कामना बढे लालिमा,हिंदी वालों के गालों की ------------अरविंद पथिक

लखनऊ कांग्रेस में बिस्मिल जी----

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वर्ष १९१६ में कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन होना था।लोकमान्य तिलक की लोकप्रियता और राष्ट्रवादी नीतियों से प्रभावित होकर पं० रामप्रसाद बिस्मिल जोकि उन दिनो - आर्य कुमारसभा के बडे संगठक थे अपने साथियों के साथ इस अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे -- ।इतिहास के उस पृष्ठ को वर्ष २००६ में प्रकाशित ' बिस्मिल चरित ' में अंकित करने की कोशिश की है।लोकमान्य और पं० रामप्रसाद बिस्मिल दोनो - को इस बहाने स्मरण कर रहा हूं --- कांगरेस का अधिवेशन इस बार लखनऊ में होगा आयेंगे ' तिलक ' औ चितरंजन प्रमुदित हर युवा मन होगा        बतलायेंगे कटु शासन से कैसे निपटें निपटायें हम इस क्रूर बाज के पंजे से कैसे निज़ात अब पायें हम भारत भर में उत्साह जगा जन - मन - में आशा लहराई लखनऊ जाके ही देखूं , सुनूं बिस्मिल मन में इच्छा आई वे नगर लखनऊ जा पहुंचे , पहुंचे विशाल पंडालो में बिस्मिल जी ने महसूस किया वे घिरे हैं विकट सवालों में गरमदली व नरमदली ...